जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम (2021)- जल प्रदूषण

दोस्तो, आज हम जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम के बारे मे विस्तृत मे जानेगे । यह अधिनियम आपको स्कूल के हर क्लास ओर कॉलेज मे काम आने वाला है ।

हम इस निबंध मे जानेगे की आखिर जल प्रदुषण को रोकने के लिए हमारी सरकार ने कोन-कोन से अधिनियम बनाए है ?

हम पर भरोसा करें, जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम को पढ़ने के बाद शायद ही आपके मनमे इसके बारे मे कोई संदेह रहेगा ।

तो चलिए शुरू करते है ।

(लेकिन अगर आपने जल प्रदूषण पर निबंध को नहीं पढ़ा तो पहले वो पढले । क्योकि उसके बिना यह समजना आपके लिए थोड़ा मुश्किल हो जाएगा ।

 

जल प्रदूषण पर निबंध जानने के लिए click here)

 

जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम

एसा नहीं हे की भारत सरकार ने जल प्रदूषण को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए है ।

भारत मे  साल 1974 मे जल प्रदूषण निवारण अधिनियम बनाया गया था । साल 1975 मे भी जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम अधिनियमित किया गया था ।

इसके बाद भी आती-जाती सरकारो ने इसमे समय-समय पर विभिन्न संशोधन किए । इसमे साल 1977 का जल उपकरण अधिनियम ओर 1988 मे का जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम भी शामिल है ।

इन अधिनियमो की एक मूलभूत उदेश्य यह था की, जल की जो पहले गुणवत्ता थी उसको फिर से लौटाना तथा उसे स्वच्छ रखना ।

 

इन अधिनियमो की मुख्य विशेषताएं

  • जल प्रदूषण का निवारण और उसको नियंत्रण मे लाना ।
  • जल को स्वच्छ रखना और उसकी गुणवत्ता को बनाए रखना तथा उसी पानी का पुनः उययोग करना ।
  • जल प्रदूषण के निवारण ओर नियंत्रण के लिया केन्द्र तथा राज्य बोर्ड का गठन करना ।

जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम 1974 की धारा 2 के अनुसार जल प्रदूषण का अर्थ यह है की,

एसा जल जो मनुष्य के लिए नुकसानकारक हो तथा औद्योगिक, कृषीय, घरेलू, व्यापारिक या अन्य वैद्यपूर्ण उपयोग मे या पशु ,पौधों के स्वास्थ्य तथा जीव-जन्तु के लिए क्षतिग्रस्त हो उसे जल प्रदूषण कहते है ।

Jal pradushan के strot

सामान्य भाषा मे जो वस्तुएं और पदार्थ जल की शुद्धता तथा गुणों को नष्ट करदे उसे जल प्रदूषण कहते है । (जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम)

साल 1984 में भारत की पवित्र नदी गंगा के जल प्रदूषण को रोकने के लिये भी गंगा एक्शन प्लान नामक एक योजना सरकार द्वारा शुरु करी गई थी ।

इस योजना मे हरिद्वार से हूगली तक 27 शहरों की लगभग 120 फैक्टरिया जो प्रदूषण फेला रही थी, उनको चिन्हित किया गया ओर उन पर रोक लगाई गयी थी ।

 

जल-प्रदूषण के स्रोत

पहले उद्योगों से निकलने वाला धुँआ औद्योगिक क्रांति का प्रतीक माना जाता था । और इस धुँए को राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के विकसित होने का अहसास मिलता था ।

कारखानों से भी निकलने वाला रंगीन और गंदा पानी इस बात का संकेत देता था कि कारखाने में उत्पादन चालू है ।

लेकिन उस समय किसी को अहसास भी नहीं था कि इस तरह से हो रहा जल और वायु प्रदूषण एक समय की गंभीर समस्या बन जाएगा ।

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हमारी संस्कृति और सभ्यता का उदय भी इन नदियों के किनारे ही हुआ था, फिर वो चाहे सिंधु घाटी की सभ्यता हो या मोहे-जो-दड़ो की ।

विदेश की मिस्र सभ्यता ने भी नील नदी के किनारे और मेसोपोटामिया की सभ्यता टरगिस नदी के किनारे जन्म लिया था ।

हम ये जानते हे की प्राण वायु के बिना हमारा जीवन कुछ मिनीटों से ज्यादा नहीं रहता, तो हमे ये भी समजना होगा की जल के बिना भी हम एक-दो दिनों से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते ।

क्योकि हमारे शरीर मे 65 प्रतिशत से भी ज्यादा भाग जल का है ।

जितना भी पानी इस दुनिया मे हे यदि हम इसको एक बाल्टी के बराबर मानें तो हमारे उपयोग के लिए जल को हम एक चाय के कप से अधिक नहीं मान सकते ।

इससे हम अंदाजा लगा सकते हे की हमारे उपयोग के योग्य शुद्ध जल की मात्रा कितनी है ।

भारत के एक लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में प्रतिदिन 16,662 मिलियन लीटर खराब पानी निकलता है ।

आपको यह जानकार भी बड़ी हेरनी होगी की गंगा नदी के किनारों पर बसे शहरों और गावों में पूरे देश का लगभग 33 प्रतिशत खराब पानी पैदा होता है । (जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम)

जब की हमारे देश की वर्तमान जल की अनुमानित वार्षिक मांग 605 अरब घनमीटर है, जो वर्ष 2025 तक 1093 अरब घनमीटर हो जाएगी ।

लेकिन फिर भी उस समय 50 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा पानी की आवश्यकता हमारे देश को होगी ।

 

जलस्रोतों में होने वाले भारी धातुओं का स्वास्थ्य पर प्रभाव

मरकरी एक जहरीली धातु है, जिसके प्रभाव से जापान में एक साथ 43 लोगो की मृत्यु हुई थी ।

हमारे पेयजल यानि पीने के पानि में अगर मरकरी हो तो वो मनुष्य के मस्तिष्क ओर तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचाती है ।

पोटैशियम बाइक्रोमेट ओर पोटैशियम क्रोमेट जैसे रासायनिक पदार्थ का निर्माण मे से निकलने वाले दूषित जल मे उत्पन्न होने वाले ठोस अपशिष्ट में क्रोमियम काफी मात्रा में उपलब्द्ध होता है ।

क्रोमियम से मनुष्य को कैंसर हो सकता हैं ।

  • लेड:

भारत के पश्चिम बंगाल राज्य मे मिदनापुर नामक जगह के जलस्रोतों पास लेड पाई गई है ।  अगर ये लेड धातु शरीर में प्रवेश करले तो पाचन तंत्र ओर मस्तिष्क पर बहोत बुरा प्रभाव होता है ।

  • आर्सेनिक:

प्राकृतिक भूगर्भीय संरचनाओं के भूमिगत जल मे आर्सेनिक धातु से प्रदूषित होने की अनेक स्थान भारत मे पाये गए है ।

आर्सेनिक धातु से मानवी को मानसिक रोग, हड्डियों में विकृति ओर चर्म रोग होते है ।

  • कैडमियम:

कैडमियम धातु से मनुष्य को हृदय रोग, उल्टी, दस्त जैसे रोग हो सकते हैं ।

इसके अलावा जल के प्रदूषण के कारण जैव प्रजातियों की कमी ओर उनमे विविधता के नुकसान के साथ कई ओर भी अपमानजनक प्रभाव होते हैं । ओर इन सभी प्रभावों को एक साथ जोड़ा जाता है तो अंत मे वो पर्यावरणीय हानि होती है ।

इसी की वजह से तो जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग ओर अम्लीय वर्षा जैसे गंभीर परिणाम हमको आगे चल कर देखने को मिलते है ।

और अंत मे जल प्रदूषण से संबंधित एक कहावत कह कर खतम करता हु । पहले जल प्रदूषण दूर करे, फिर अपनी सावधानियां अपनाएं, ना जहर घोले इसमें, ना यू कीचड़ फैलाये, जल ही हे हमारा जीवन, इसको हम अपनाकर स्वच्छ भारत बनाए ।

आखिर मे आपसे पूछना चाहता हु की, क्या आपको यह जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम का लेख कैसा लगा ?

हमने पूरी कोशिस की है ताकी आपको सरल और साधारण भाषा मे जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम से संबंधित माहिती दे सके ।

लेकीन फिर भी आपको कोई समस्या हो तो आप हमे email जरूर करे । आपको और भी किसी विषय पर निबंध चाहिए तो कॉमेंट मे जरूर बताए ।

और इसे अपने शेर करना ना भूले । (please share)

 

Thanks for reading जल प्रदूषण निवारण संशोधन अधिनियम

 

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